सोमवार, 4 मार्च 2013

'शैल प्रतिमाओं से' की कुछ कविताएँ

कानपुर में जन्मी, बनारस में पढ़ने और पढ़ाने वाली और नीदरलैंड में 'हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन' के निदेशक के रूप में हिंदी के पठन-पाठन की जिम्मेदारी निभा रहीं बहुमुखी प्रतिभा की धनी पुष्पिता अवस्थी का 'शैल प्रतिमाओं से' शीर्षक एक अनोखा कविता संग्रह है, जिसमें उनकी हिंदी में लिखी कविताओं के साथ अंग्रेजी और डच में हुए अनुवाद भी साथ-साथ प्रकाशित हुए हैं । इस संग्रह ने पुष्पिता जी की कविता की पहचान को अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप दिया है । पुष्पिता जी की कविता का मुख्य स्वर प्रेम है । मौजूदा समय के घमासान में जहाँ सौन्दर्य-बोध के स्रोत तेजी से सूखते जा रहे हैं; जहाँ प्रेम को एकदम निजी अनुभूति मानकर व्यापक दृश्य से अलग किया जा रहा है या उसे निर्वासित करने की चेष्टा की जा रही है वहाँ प्रेम के लिए जगह तलाश कर उसे बचाए रखने का एक जरूरी हस्तक्षेप पुष्पिता जी की कविता ने किया है । पुष्पिता जी का रचना-संसार, जितना इस संग्रह की कविताओं में प्रकट हुआ है, लौकिक संबंधों और ऐन्द्रिय प्रतीतियों का संसार है जिसमें व्यक्ति, सशरीर या मनसा कवि के अनुभवों का माध्यम बनता है । उनकी कविताओं में उस निर्वैयक्तिक संवेदना का प्रमाण मिलता है जो अपने अनुभव से तटस्थ होकर अपने को देखने अर्थात कविता करने के लिए जरूरी समझा जाता है । यहाँ प्रस्तुत कविताएँ 'शैल प्रतिमाओं से' कविता संग्रह से ली गईं हैं ।

।। अनमिट परछाईं ।।

सूर्य को
सौंप देती हूँ तुम्हारा ताप
नदी को
चढ़ा देती हूँ तुम्हारी शीतलता
हवाओं को
सौंप देती हूँ तुम्हारा वसंत
फूलों को
दे आती हूँ तुम्हारा अधर वर्ण
वृक्षों को
तुम्हारे स्पर्श की ऊँचाई
धरती को
तुम्हारा सौंधापन
प्रकृति को
समर्पित कर आती हूँ तुम्हारी साँसों की अनुगूँज
वाटिका में
लगा आती हूँ तुम्हारे विश्वास का अक्षय वट
तुम्हारी छवि से
लेती हूँ अपने लिए अनमिट परछाईं
जो तुम्हारे प्राण से
मेरे प्राणों में
चुपचाप कहने आती है
तुम्हारी भोली अनजी आकांक्षाएँ
तुम्हारे दिन का एकांत एकालाप
तुम्हारी रातों का एकाकी करुण विलाप
मंदिर की मूर्ति में
दे आती हूँ तुम्हारी आस्था
ईश्वर में
ईश्वरत्व की शक्ति भर पवित्रता
तुमसे मिलने के बाद ।

।। समर्पण के नाम संबोधन ।।


अपनी फड़फड़ाहट
सौंप देती है पक्षियों को

अपना ताप
लौटा देती है सूरज को


अपना आवेग
दे देती है हवाओं को

अपनी प्यास
भेज देती है नदी के ओंठों को

अपना अकेलापन
घोल देती है एकांत कोने में

फिर भी
हाँ ...फिर भी
उसके पास
यह सब बचा रह जाता है
उसकी पहचान बन कर

मंदिर में
ईश्वर को हाजिर मानकर
वह लौटा देती है
अपनी आत्मा
गहरी शांति के लिए

बहुत
खामोशी है
शब्द की तरह

आँखें
खुली हैं
किताब की तरह

हाथ की ऊँगलियों में
फँसी है पेंसिल
उतरती है उससे काँपती रेखाएँ
और सिहरते शब्द

मन
अब तक नहीं जान पाया
कैसे कहे अपनी बात
कि वह समझी जाये
जो वह कहना चाहता है
ईश्वर को ईश्वर
और
जरूरत को जरूरत  

।। मैं जानती हूँ ।।

मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
फूल जानता है गंध
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
पानी जानता है अपना स्वाद
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
धरती जानती है जल पीना
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
फूल जानता है अपना फल, अपना बीज
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
हवाएँ पहचानती हैं मानसूनी बादल
बादल जानते हैं धरती की प्यास
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
शब्द जानते हैं अपने अर्थ
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
पृथ्वी जानती है सृष्टि का ऋतुचक्र
ऋतुचक्र जानते हैं अपने फल, फूल, फसल
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
वर्षा पहचानती है अपने कीट-पतंग
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
फुनगी जानती है जड़ों की जरूरत
और जड़ें पहचानती हैं फुनगी की खुराक
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
बीज सूँघते हैं ऋतुओं की गंध
और पृथ्वी जानती है बीज की अकुलाहट
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
स्त्री अनुभव करती है
भ्रूण के शिशु होने का स्पंदन
जैसे
आत्मा जानती है देह की जरूरत
देह जानती है आत्मा का सुख ।

।। देह का निर्गुण और सगुण ।।

देह की देहरी पर
प्रेम
सुख बनकर आता है
मन देह की खातिर
ह्रदय के आले पर
अबुझ दीया धर जाता है
देह के
अंतर्मन की भित्ति पर
टाँग देता है
कई स्वप्न कैलेंडर
कैलेंडर की छाती पर
होते हैं प्रणय के जीवंत छाया चित्र
गतिशील चलचित्र
पग-तल में होता है जिनके
वर्ष-चक्र तिथियाँ, दिवस, माह

देह से घिरे, घर-भीतर
पकती है प्रेम-गंध की रसीली रसोई
कभी तृषा मिटाने के लिए
कभी तृषा जगाने के लिए ।

देह-गेह के प्रांगण-बीच
टँगा है मनोहर पिंजरा
पला है जिसमें हरियाला तोता
देह-गीत गाता है जो
लोकगीतों की तरह
मनकथा कहता है जो
किस्सा-गो की तरह
देह के भीतर
मन की खँजड़ी पर
ध्वनित होता है
देह का निर्गुण और सगुण ।

।। चिट्ठी से ... ।।

चिट्ठियाँ
दुःख पूछने आयेंगी
शब्द
आँसू पोंछेंगे
आँखें
प्रेम के बैठने के लिए
शहर में
कोई पार्क ...
कोई रेस्तराँ
कोई प्लेटफॉर्म ...
कोई बेंच ...
कोई धँसा ढाबा ..
कोना-अतरा जैसा
ठियाँ नहीं खोजेंगी
सिर्फ देखेंगी
          कैलेंडर
          तारीखें
और डाक-विभाग की तत्परता

चिट्ठियाँ
समय पार लगाएँगी
जिन के
शब्द कभी ओंठ की तरह
          सिहरेंगे ...काँपेंगे ...सूखेंगे
शब्द कभी आह से थकी-मुँदी
          आँख की तरह चुप मिलेंगे
पढ़कर आँखें जानेंगी
गीला दुःख
कसकता ताप
अकेलेपन का संताप
मौन का संत्रास
जो किसी से कहा नहीं जा सकता
सिवाय
चिट्ठियों के आत्मीय वक्ष के

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