शनिवार, 9 मार्च 2013

।। तुम्हारे जाने के बाद ।।

तुम्हारे जाने के बाद
छूट जाता है तुम्हारा जीना मुझमें
एक पूरी जीवंत ऋतु की तरह
हम दोनों एक दूसरे को जी लेते हैं
अपनी प्रसुप्त पाँखे खोल
प्रणय प्रसूति हेतु

तुम्हारे जाने के बाद
आँखों के आँचल की खूँट में
खिला-महकता बसंत
आस्था के अक्षत की तरह
छूट जाता है बचा हुआ
बँधा रहता है पवित्र संकल्प-सा

तुम्हारे जाने के बाद
सम्पूर्ण पृथ्वी पर रची हुई दिखती है
प्रणय के बसंत की कान्तिमान रंगत
स्मृतियों की जड़ों में रस-रंग घोलती
तुम्हारे अधबोले शब्द
शब्दों के अंत का
सिहरता गुलाबी मौन
करता है पृथ्वी पर
अपने होने की सृष्टि
अवतरित होता है
अबुझ ...गतिशील नक्षत्र लोक
पसरता है प्रणय-उजास का अमिट प्रकाश
मन-धरती की दरारों को अपनी रोशनी से भरता

तुम्हारे जाने के बाद
कर्ण-गठरी कि मन-गठरी में
रखे गए तुम्हारे शब्द
मेरे प्राण धरोहर
मृत को जीवंत
निष्प्राण को प्राणवान
अपने शब्दों की
जिजीविषा से देते हो प्राण
प्रणय की ...प्रणय प्रतीक्षा के लिए
संजीवनी शक्ति

तुम्हारे जाने के बाद
मेरी देह में
नहीं बचते हैं पाँव
मेरी आँखों को
नहीं सूझता है कुछ
तुम्हारी अनुपस्थिति में
रिस कर तैरने लगता है
मौन आँखों की झील में तुम्हारा न होना
नसों में धधकती है
दहकती दूरियों की बेचैनी भरी उमस
अनुभूतियों में
अजनबी शून्य करवटें लेने लगता है
भीतर-ही-भीतर
सब कुछ ठोस और ठस होने लगता है
तुम्हारी अनकही महक
साँसों में लिखती है
एक अनमिटी इबारत
तुम्हारे मन-शब्द
तुम्हारी गंध-उपजे
विविधवर्णी शब्द
सतरंगी शब्द
स्वप्नमय शब्द
रचते हैं साँसों के अर्थ का यथार्थ
जिसे छू सकते हैं
जैसे अनुभव करते हैं - तुम्हें
तुम्हारे शब्दों में तुम्हारी छुअन में

तुम्हारे जाने के बाद
तारीखों में ऐसा होता है सूर्यास्त
कि जैसे प्राणास्त
देह
समय की चिता पर
मुखाग्नि की प्रतीक्षा करती है
अंततः
तुम्हारी ही
तुम्हारे जाने के बाद भी ।

('शब्द बन कर रहती हैं ऋतुएँ' कविता संग्रह से)

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