।। प्रणय-संधान ।।

























पिय को
वह 
पुकारती है 
        कभी सूर्य 
        कोई नक्षत्र 
        कभी अंतरिक्ष 
        कभी अग्नि 
        कभी मेघ 
        कभी सृष्टिदूत 
        कभी शिखर 

स्वयं को 
मानती है 
        कभी पृथ्वी 
        कभी प्रकृति 
        कभी सुगंध 
        कभी स्वाद 
        कभी पुलक 
        कभी आह्लाद 
        कभी सिहरन 

और सोचती है 
अनुभूति का रजकण ही 
प्रणय है 
आत्मा से प्रणय-संधान के लिए । 

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