मंगलवार, 1 मार्च 2016

।। मेयर पिट ब्रुइनोओगे अल्कमार ।।


















( एक )

जब
कविता पढ़ने के लिए
उमड़ता है उसका मन
निकल पड़ता है
रेतीले तट पर
लहरों की हथेलियों से बनी
पगडंडियों की ओर

उसे लगता है
कविता की धरती पर
वह जैसे रख रहा है
अपनी संवेदना के तलवे
और महसूस कर रहा है
कविता की कोमलता
पृथ्वी के पृष्ठों पर

जब
कविता जीने के लिए
उमड़ता है उसका मानस
निकल पड़ता है
हरियाले रास्तों की ओर
हवाएँ सहलाती हैं उसके केश
स्पर्श करती हैं उसका भाल

सीज उठता है
वह
प्रणय के स्पर्श से

( दो )

उसकी आँखें
समुद्र तट पर
बदल जाती हैं अंजुलि में
पान करता है प्रणय की तासीर
समुद्री लहरियों से

उसकी हथेलियों में
समा जाती हैं हवाओं की हथेलियाँ
और वह महसूस करता है प्रेम
कभी प्रकृति का
और कभी प्रिया की हथेलियों का

अकेले में भी
समेटता है हवाएँ
उनकी आर्द्रता
इस तरह नहीं रहता है अकेला
और अन्तस् में
समेटता है सृष्टि
             पृथ्वी
             जल
             सूर्य-ताप
             अंतरिक्ष-लोक

तृप्त होती है
उसकी आत्मा
जैसे उसने
आत्म सात कर लिए हैं
पञ्च तत्व
अपनी ही देह में
प्रणय देह को
रचने के लिए

जो हमेशा साथ रहे उसके
उसकी साँस की तरह
जिसे वह महसूस कर सके
अपनी धड़कनों की तरह
जिसे वह सुन सके
अपनी आत्मा के संगीत की तरह
जीवन को सुरों में बदलने के लिए

( तीन )

इतिहास
उसका पहला प्रेम है
क्योंकि
इतिहास ने ही
जन्मा है उसे
जिसमें खड़ा है वह
अपने समय को इतिहास बनाने में
साक्षी की तरह

( चार )

कविता
उसकी हार्दिक सहचर है
उदासियों से उसे
अलगाती है
संशयों में उसे
सुलझाती है
और जब जब
उसे जरूरत होती है
कविता उसके साथ होती है

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें