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।। नेह-छाल ।।

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अपनी साँसों के स्कॉर्फ में सहेजती हूँ     सुनहरे बसंत की पीली खुशबू तुम्हारी साँसों की रेत पर 'सनी डे' रचाने के लिए स्वर्णिम इबारत 'समय' पतझर की तरह उतरता है मेरी धड़कनों में गहरे जंगल में अँधेरे की तरह फँसा है      मेरा समय समय की शाखों में हवाओं की तरह उलझकर झटपटाती है मेरी साँस घने जंगल में कुहरे के रंग में अटकी हैं उम्मीदें रात की स्याही से अपनी उँगलियाँ गीली कर धरती पर उतरे हुए सूरज की देह पर लिखती हूँ    तुम्हारा नाम अपने समय के तने की छाल को छील कर उस पर तुम्हारी सहलाई हुई उँगलियों से भीगे अपने नाखूनों से कुरेद कर लिखा है तुम्हारा नाम जिसे मेरी आँखें पढ़ती हैं साँसें चूमकर रचती हैं प्यार की नई अनश्वर भाषा हवाओं में सींजने के लिए जिससे पूरे विश्व के मानव की साँसों की भाषा बदल सके सिर्फ तुम्हारे नाम पर । ('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

।। आत्मीय उपासना ।।

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आँसू लिखित शब्दों में होता है    ईश्वर ईश्वर के कंधों पर टिकाती हूँ अपनी आँखें और भूल जाती हूँ     आँसू जो तुम्हारी अनुपस्थिति की आँख से उतरा है मन-गंगोत्री की व्यथा में तुमसे कहने की सारी बातें वियोग में घुल कर आँसू बन जाती हैं अपनी साधना में प्रसाद के रूप में मैं भगवान से तुम्हें और तुम्हारी खुशी माँगती हूँ तुम मेरी आँख की आँख हो मैं तुम्हारी ही आँखों को अपनी दृष्टि बनाकर दुनिया देखती हूँ ओठों ने तुम्हारा नाम पुकार कर अपनी धरती में तुम्हारे ओठों को घर बनाने की अनुमति दी है हथेली ने तुम्हारी हथेली को अपनी संपूर्ण पृथ्वी सौंप दी है स्मृति में तुम्हारा रूप बसाकर ईश्वर की तरह पूजा की है रागिनी में राग की तृषा पर तुम्हारे अनुराग की शक्ति दी है अपनी देह की पृथ्वी मैंने तुम्हारे और तुम्हारी संतान के नाम कर दी है जहाँ वे तुम्हारा नाम लिखें सिर्फ मेरे सुख के लिए तुम्हारे लिए भगीरथ की तरह अपने भीतर भागीरथ की तलाश की है तुम तक पहुँच कर अपन...

।। अक्षय-स्रोत ।।

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शब्द तुम्हारी तरह देखते हैं    मुझे और मैं शब्दों को तुम्हारी तरह ईश्वर के प्रेम की छाया है     तुम्हारी आत्मा पर ईश्वर अंश है तुम्हारा चित्त तुम्हारे प्रेम में मैं 'प्रेम' का ईश्वर देखती हूँ तुम्हें छूकर मैं प्रेम का ईश्वर छूती हूँ तुम्हारे कारण पाषाण में बचा है   ईश्वर शब्दों में तुमने रचा है     ईश्वर क्योंकि तुमने ही तुम्हारे अस्तित्व में रचा है ईश्वर इसीलिए तुममें है ईश्वर का प्रेम ईश्वरीय प्रेम पवित्र पारदर्शी प्रणय नदी का उद् गम अक्षय स्रोत । ('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

।। शब्दों से खींचती हूँ साँस ।।

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विदेश के प्रवास में अँधियारे के मीठे उजालेपन में चाँदनी, सितारों में जब चमक चुकी होती है चाँद सोता है जब तुम्हारे सपनों में अकेलेपन की पिघलती मोमबत्ती की सुनहरी रोशनी में कभी शब्द तपते हैं ताप में और कभी मैं शब्दों के साथ अपने बाहर की ही नहीं भीतर की भी साँस रोककर शब्दों से खींचती हूँ साँस पसीने से तर-ब-तर मन की उमसती कसक को पसीजी हथेली में रखती हूँ शब्द बनाकर तुम्हारे लिए लिखे जानेवाले शब्द हों वे जैसे हृदय-मंजूषा में प्रेम की पीड़ा के बहुत एकांत में चुपचाप जन्म लेते हैं शब्द जैसे आधी रात को पहर बदलता है हवाओं की साँस ठहर जाती है क्षण भर को तब सितारे लिखते हैं      नई तारीख नया दिवस सूरज हर सुबह छींटता है नई उत्सव रश्मियाँ जैसे वे भी शब्द-बीज हों अगले भविष्य के लिए । ('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

।। आकाशगंगा ।।

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तुम्हारे बिना समय     नदी की तरह बहता है मुझमें मैं नहाती हूँ     डर की नदी में जहाँ डसता है अकेलेपन का पनीला     साँप कई बार मन-माटी को बनाती हूँ     पथरीला जिसकी देह को अपने स्पर्श से तराशकर तुमने बनाया है    मोहक सुख की तारीखों को दफन करता है    समय मन के कब्रिस्तान में कपोत-सी उड़ जाती हैं - साँसें तुम्हारे वक्ष में धड़कने के लिए तुम्हारी स्मृतियों की परछाईं में पकड़ती हूँ तुम्हें अपने भीतर के मौन में जीती हूँ   तुम्हारा ईश्वरीय प्रेम तुम्हारी चुप्पी में होता है तुम्हारा सलीकेदार अपनापन अकेले के अंधेरेपन में तुम्हारा नाम     भगवान् ब्रह्मांड का एक अंग देह की आकाशगंगा में तैरकर आँखें पार उतर जाना चाहती हैं अपने ठहरे हुए समय के शिखर से पटकर तुम्हारी धड़कनों के साथ चलना चाहती हैं     मेरी साँसें ('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

।। महामंत्रोच्चार ।।

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प्रतिदिन सूर्योदय के साथ आदित्यस्त्रोत के महामंत्रोच्चार के बाद सूर्य से नमित-नयन प्रार्थना की दमकते प्रणय की जो प्राण शक्ति बने और आत्मा को दीप्तमान् करे अपने प्रकाश-लेप से अपनी हर धड़कन में वर्तमान की सुबह में चीखी हूँ पक्षियों की चहचहाहट में प्रेम से अधिक अपने प्रिय की पुकार में मेरी आत्मा प्रिय सहचर की खोज में हर साँस में रही है एकाकी यायावर   उसका आत्मीय अकेलेपन में पहचान ले उसे और बगैर उसके कहे उसके हृदय की भाषा को सुन मौन निमंत्रण में बन जाए उसका उसकी देह से भी अधिक आत्मीय सहचर ।   ('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

।। तरंग ।।

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                              जिंदगी शैंपेन की एक बूँद लेकिन, तुम्हारे होने पर   अकेले में 'वह' जहर की एक बूँद है मौत के डर से भरी   जिंदा देह में जिंदगी की मौत अपने भीतर एक 'मसान' तट को जन्म देना है । मेरी ऑंखें मछली की आँखों की तरह प्रूप-समुद्र तैरती तुम्हारी आँखों के नॉर्थ-सी में जहाँ से सूर्यास्ती-सिंदूर को अपनी आँखों की चुटकी में लेकर मेरे भाल पर भरा था तुमने   संध्या के सूर्यास्ती अग्नि-कुंड की परिक्रमा की थी मेरी हथेली ने तुम्हारी हथेली की भावी भाग्य रेखा में पहनाई थी   सूर्य रश्मियों से लहरों में बनी तरंगित वरमाला   नॉर्थ-सी को अपनी अँजुली में लेकर तुम्हारी साँसों ने कसम खाई थी आजन्म-समुद्र की तरह अपने प्यार से भर देने की   तुम नॉर्थ-सी हो और मैं तुम्हारे भीतर समाई तुम्हारे मन की सामुद्री मछली जिसकी आँखों और मन की मौन की भाषा पहचानते हो तुम । ('र...