शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

।। स्वत्व ।।


















शताब्दियों की यात्रा करते हुए
थक चुके हैं शब्द !

शब्दों को नहीं दिखता है
          ठीक-ठीक ।
नई शताब्दी की चकाचौंध से
धुँधला गई हैं आँखें

पुरानी शताब्दियों के युद्ध के खून से
लाल हैं शब्द की आँखें

युद्ध
नई शताब्दी के मठाधीशों का
रंजक नशा है ।

डरती हैं शब्दों की आँखें
सत्ता से आँख मिलाने में
और
सहमती हैं आँसू भरी आँखों से
अपनी छाती मिलाने में ।

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