शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

।। संसद-सवाल ।।

























पार्लियामेंट प्रश्न
पी हुई सिगरेट का टुकड़ा हैं 
जिसका धुआँ
जी लिया है
संसद के फेफड़ों ने ।

चिटखटी हुई चिनगारी की तरह
संसद से दौड़ते हैं सवाल
मंत्रालय के सचिवों की
सुविधाभोगी मेजों से ।

संसद के फूले हुए नथुनों से
छोड़ी हुई साँस की तरह
फुफकारते हुए दौड़ते हैं
पार्लियामेंट प्रश्न
दूर-दूरस्थ राजदूतावासों की
फैक्स मशीन और कम्प्यूटर तक का
हो जाता है जीना हराम ।

पार्लियामेंट क्वेश्चन
संसद सवाल
चुने हुए लोगों की
अमन चैन की व्यवस्था में
खलल डालने वाले
कारकों के विरुद्ध होती है
एकल कार्यवाही ।

संसद के सांसद
वातानुकूलित कक्षों की तरह
वातानुकूलित रखना चाहते हैं
अपना दिल-दिमाग
और उसकी धड़कनें ।

आम जनता के
आँसू के पारे को
अपने थर्मामीटर का
हिस्सा नहीं बनाना
चाहते हैं वे ।

आम जनता के जीवन-वन में
पल रहे जंगलराज से बेफिक्र
देश की चिंता से बेखबर
विश्व चिंताओं के साथ
खड़े दिखना चाहते हैं वे ।

देश के प्रतिनिधि नेता
विदेश और विश्व की चिंता में
घुले जा रहे हैं
विदेशी मुद्रा के बिना
कैसे चलेगा उनका घर-द्धार ।

गांधीवादी खादी वस्त्रों के भीतर
विदेशी जाँघिये और जुराबें
उनको बनाए रखती हैं विदेशोन्मुखी
पाश्चात्य देशों की सुगंध में
पलती है आचरण-संहिता
बियर और वाइन की
आत्मानन्दी रंगीन शामों में
भूल जाते हैं देश की सिसकियाँ
और भुलावे के लिए तैयार करवाते हैं
पार्लियामेंट क्वेश्चन
व्यवस्था को चुप करने के लिए
कुछ झाड़ पिलाते रेडिमेड क्वेश्चन ।

सिर्फ
मंत्रालयों, अख़बारों और मीडिया में
यह जताने के लिए
संसद के भीतर
सांसद बेसुध नहीं
जागे हुए हैं देश के लिए ।

संसद सवाल
प्रजा के विरुद्ध
लेकिन
प्रजा के समर्थन का
लोकतंत्री दरबारी राग है ।

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