शुक्रवार, 6 जून 2014

।। प्रवासी शब्द ।।




















सूरीनाम की धरती से
चाँद के वक्ष पर
आँखों ने लिखी है चिट्ठी
प्रतीक्षा में

चाँद के ओठों पर
रखा है अपने अधरों का
स्नेह-अमृत
तुम्हारे लिए

चाँद की आँखों को
सौपें हैं वासंती स्वप्न
तुम्हारी सूनी आँखों को
भरने-पूरने के लिए

ह्रदय से निचुड़कर
आते हैं शब्द शहद की तरह
शब्द शहद रचते हैं
प्रणय का सुगन्धित संवाद
प्रणय
प्रिय का मधु पुष्प है
राग अनुरंजित पराग

तुम्हारे शब्दों में
ह्रदय की अनुभूतियों की चमक है
और प्रणय की अन्तःसलिला का
शीतल अमृत-स्पर्श

नक्षत्रों की तरह
निहारती हूँ तुम्हारे शब्द
मेरे लिए
वे ही हैं सप्तर्षि
वे ही हैं ध्रुवतारा

शब्दों के मौन में
होती है आत्मा की जिजीविषा
अव्यक्त पर व्यक्त
तुम्हारे शब्द इसीलिए
सीते हैं धागे की तरह
मेरा फटा हुआ समय ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें