गुरुवार, 12 जून 2014

।। समय की आँखों में ।।

























समय
खा रहा है मुझे
मैं लील रही हूँ समय

समय
समाधि ले रहा है मुझमें रोज
मैं समाधिस्त हो रही हूँ नित्य
समय में

समय की माटी में
मिल रही है मेरी साँस
समय की माटी को
सान रहा है मेरा रक्त
समय-घट में
मन को शब्द बनाकर
रख रही हूँ अकेले में
मर रहे समय को
जिलाने में लगी हूँ
सावित्री की तरह
समय मेरा सत्यवान है

सर्वस्व समर्पित कर
मानस-देह में
रच रही हूँ समय
अपने ही रक्त-मांस से
काढ़ कर बना रही हूँ समय
सबके लिए समय
विषम परिस्थितियों के विरुद्ध
साहचर्य के निमित्त

समय का अपहरण
कर रहे हैं लोग
नशे के लिए, लोग
पी लेना चाहते हैं समय
स्वार्थ के लिए लोग
भोग लेना चाहते हैं समय
देश-ध्वजा को लोग
पहन डालना चाहते हैं
परिधान की तरह
देश-प्रेम के नारे के साथ
शहीदों के खून से बनी
देश की आजादी को
भोग लेना चाहते हैं लोग

समय के भीतर से
निकाल लेना चाहते हैं
लोग, देश की आँखें
ऐसे कठिन समय में
परदेश में, सात समुन्दर पार
चलकर अपने साथ आए
समय को साध रही हूँ मैं
और समय साध रहा है मुझे
समय की आँखों में देखती हूँ मैं
समय देखता है मेरी आँखों में ।

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