गुरुवार, 19 जून 2014

।। घर की याद में ।।












स्वदेश के घर के
अपने कमरे में
छूटा हुआ आदमकद आईना
कि जैसे समय
अपने सामने तुम्हें पाकर
पूछता होगा तुमसे
मेरे बारे में

मेरी अनुपस्थिति को
पूरता होगा समय
साक्षात मेरी तरह

और तुम
गहरी उदासी से थकी
ठंडी आह-भरी साँस से
गीला कर देते होगे
आईने का दमकता वक्ष

तुम्हारी साँसों के
गीले धुएँ से ओसाकर
धुँधला जाती होगी उसकी चमक
ओदेपन में जिसके
छिप जाता है आँसुओं का रिसाव

सात सागर पार
सूरीनाम की धुपीली धरती से
देखती हैं तुम्हें
मेरी आँखें
खुशी की लहक से सराबोर होने के लिए
अब प्रिय की तलाश में
सिर्फ भटकती है
किसी नक्षत्र की तरह

शब्दों में खोजती हूँ उनके लिए रास्ता
कभी वह मुझमें खोजती है रास्ता
परदेश में
बगलगीर बन खड़े हुए शब्द
आत्मशक्ति के प्रतीक बन
आँखों की देह-धरा पर
धान की तरह बोते हैं
जीवन समर्थक
सपनों के शब्द

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