गुरुवार, 5 मई 2016

।। काग़ज़ पर ही सही ।।


















तुम्हारी तस्वीर से
करती हूँ
इतनी बातें
कि वह बोलने लगती है

तुम्हारी नाक पर
धरती हूँ
अपनी नासिका
महसूस होने लगते हो तुम

तुम्हारी आँखों को
देखती हूँ एकटक
तस्वीर में ही
भीग उठती हैं   तुम्हारी आँखें
मेरे आँसुओं से

तुम्हारे
मुस्कुराते सकुचे होंठों पर
रखती हूँ अपने अधर
इस क़दर
कि वे भी मुस्कुरा पड़ते हैं

काग़ज़ पर ही सही
दूरियों को नापने की
साकार कोशिश

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