।। हथेली ।।

 














अकेलापन   
पतझर की तरह
उड़ता फड़फड़ाता है

प्रिय की तस्वीर से
उतरता है
स्मृतियों का स्पर्श
देह मुलायम होने लगती है
चाहत की तरह

हथेलियों से
हथेलियों में
उतरती है
आत्मीयता की छाया

प्रेम की भाषा
प्रेम है
सारे भाष्य से परे

प्रणय
एकात्म अनुभूतियों की
अविस्मरणीय दैहिक पहचान है

देहाकाश में
इंद्रधनुषी इच्छाओं के बीच
तुमसे कहने की सारी बातें
वियोग में घुल कर
बन जाती हैं    अक्ष
और पोंछती हैं 
अकेलेपन के चिन्ह

(भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

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