गुरुवार, 13 अक्तूबर 2016

।। नवातुर गर्भिणी ।।
















वह ख़ुश है
अपनी देह के जादु से भरकर

इठलाती है   रह रह कर
हँसी में रचाती है
अनदेखी ख़ुशी का सुख
कि कुछ माह बाद
निज हथेलियों में खिलाएगी
अपने प्रणय की नवजात हथेलियाँ
अपनी देह से जन्मी आँखों में लखेगी
मन के कोमल स्वप्न

हथेलियों को भरेगी
अपने शिशु की मुट्ठियों से
निज ओंठों से चूमेगी
उसकी अधर-सी देह
अपने वक्ष से लगाएगी
नव-आत्म शिशु की पुलकित देह

वह आह्लादित है कि
उसकी स्त्री देह
प्रेम में
ईश्वर हो गई है

('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

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