गुरुवार, 17 नवंबर 2016

।। शब्द-स्पर्श ।।

शायद
हवाओं की साँस ठहर जाती है
क्षण भर के लिए
जब
सितारे लिखते हैं    नई तारीख़
अनुभूति-पट पर
प्रथम-प्रणय का राग

सूरज
हर सुबह
नई तारीख़ में झरता है
अपनी धूप से

जैसे 
प्रेम
पूरता है   हृदय के अक्षय-स्पंदन-कोष को
जैसे   पर्वत
जनमते हैं   अपनी स्नेह सरिताएँ

शब्दों की शहदीली सुनहरी दीप्तिमान छुअन को
जानते हैं     ओंठ
जैसे    कवि के अधर
पहचानते हैं      अपनी कविता के शब्द
वैसे ही     कविता के ओंठ
अनुभव करते हैं      कवि के अधर
शब्दों की तरह
शब्दों में प्रेम की तरह

('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

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