सोमवार, 18 नवंबर 2013

।। जंगल जग के मानव प्राणी ।।


















अमर इन्डियन के गाँव

सघन घन बीच
पथ और पगडंडियों से परे
विमान ही पहुँचने का एकमात्र माध्यम जहाँ
और दृष्टि ही पथिक

नदियाँ हैं
जंगल का रास्ता
और जंगल देते हैं
नदियों को रास्ता

वृक्षों की देह से बनी
लम्बूतरी डोंगी ही
गाँव से गाँव
जंगल से जंगल
तट से द्धीप की दूरी का वाहन
जलवाहन ही केवल साधन

सघन घन बीच
मछली-सी बिछलती तैरती
जंगली मानसूनी पानी पीकर
जीवन जीती नदियों में
अपने जीवन की कटिया डाले हुए जीती हैं वन जातियाँ
अमर इन्डियन परिवारों में
परिवार कबीलों में
और कबीलों के लोग
जंगलों में तीर-धनुष और भालों से करते हैं शिकार

वृक्षों के तनों के ऊपर से
शुरू करते हैं अपने काष्ठ-घर
और विह्वर मंकी (बुनकर वानर) की तरह
बुनते हैं अपना हैमक पालना
वृक्षों के वक्ष-बीच तना झूलता
उन्हीं के पाँव पर खड़े हैं अमर इन्डियन के बसेरे
लकड़ी के पटरों और लट्ठों से
बने हैं घरों के घोंसले
चार फुट की ऊँचाई से
शुरू होते हैं अमर इन्डियन के वन-जीवी घर
तासी पत्तियों की छत ओढ़े हुए

कपासी सूत के हथ बने
पालनों में पड़ी जिंदगी
कसाबा रोटी
और मछली शोरबे में
जीती है अपना रात-दिन
कसीरी शराब की
गुलाबी रंग-गंध में
देखती है उल्लासी स्वप्न
थमी हुई जिंदगी की
ठहरी हुई मौत में
जिंदगी जागने के सपने

झरनों में अटकी
वृहत मछलियों के फँसने पर
हिरणी की हड्डी की सी बाँसुरी पर
धरकर अनुरागी ओंठ
फेंकते हैं साँस
उमंगी उत्सव के लिए

कभी राग से भरकर
कछुए के खोल पर
शहद के मोम को यंत्र पर चढ़ा कर
देते हैं उँगलियों से राग भरी रगड़
और छेड़ते है
अनूठी जंगली टेर
कि वन देवी
प्रसन्न हों अलोप ही
देखें समर्पण नृत्य
और आशीषें कि वे बचाये हुए हैं वन
और वन-माँ को

डॉलरी और यूरो 'सभ्यता' के
दारू दम जत्थों की
भोग परस्ती के बावजूद
मिलने पर उनसे
हाथ तो मिलाते हैं अपना
लेकिन
ह्रदय और प्राण सहेजे रखते हैं प्राण प्रण से
वन देवी की पूजा के लिए ही
वन देवी के घर
जो हैं वन के भीतर
और उपासना करते हैं
सूर्य, चंद्र और पृथ्वी की वर्ष भर

अमर इन्डियन
जीते हैं अपनी भक्ति में
निज की शक्ति
आत्मीय सँस्कृति की आत्मीय भाषा में
मानवोचित और मानवीय

अमर इन्डियन
नहीं सीखना चाहते हैं
ड्यूरो और डॉलर कमाने वाली
धोखे और ठगी से भरी
छल-प्रपंच की कृत्रिम मीठी भाषा
ब्राजील के
अमर इन्डियन की
कसीरी देशी शराब-सी है
धीमी ध्वनि और गति गति की
मोहमयी मृदुल भाषा
अपनेपन के मधुरास के
बीज-शब्द से संपन्न
कि उन्हें मनोरंजन के लिए
कभी किसी टी वी या ब्ल्यू फ़िल्म
या पब या बार या क्लब की
जरूरत नहीं पड़ती

अमर इन्डियनों के
अध्-वस्त्र में भी
आच्छादित है नग्नता
जबकि जादुई सभ्यता की चकाचौंध में
पल रही
तथाकथित सुंदर से सुंदरतर सभ्यता भी
नग्न से नग्नतर लगती है कि
देह पर पड़ा हुआ वस्त्र
देह को ढकने से अधिक
             उघार कर रख देता है देह कि
             मनुष्य को
             हिंसक बनने में
             देर नहीं लगती है
             सारी सभ्यताओं के बावजूद ।

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