शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

।। गर्भस्थ माँ ।।


















इकली गर्भस्थ स्त्री
सकेल लेना चाहती है अपनी साँसें
गर्भस्थ शिशु के प्राण के लिए

वियोग-संतप्ती अपनी माँ की साँसों से
खींच रहा है साँस
प्रणयी शिशु
देह भीतर
अपनी माँ की तरह

सैनिक पिता की अनुपस्थिति की अनुभूति ही
रक्त-पहचान गर्भस्थ शिशु की

आँखों का अँधेरा
आँसू में
घोल रहा है
इतिहास की काली स्याही
माँ के एकाकीपन का तिमिर
गर्भ-कोठरी में

आकाश-गंगा का नक्षत्र
प्रेम गंगा का सितारा
अवतरित हुआ
विरही माँ की देह में
प्रणय का शिशु
चाहत के गर्भ में

सामुद्रिक दूरियों के बीच
छटपटाती है हृदयाकुलता मछलियों सरीखी
मँडराती रहती हैं आकांक्षाएँ तितलियों सी
ह्रदय के रिक्त वक्ष-मध्य
अकेली माँ और शिशु के भीतर एक साथ

खुँटियाएँ शुष्क पौध
और अरुआये काँटे सा
धँसता है अकेलापन
माँ और गर्भस्थ शिशु भीतर

प्रिय की साँसों के साथ
साँस लेना चाहती है गर्भस्थ स्त्री
शिशु की साँस के लिए
अपनी ही तरह से

शिशु के पिता की आवाज को सुनकर
धड़कना चाहता है माँ का ह्रदय
शिशु के लिए
कि वह
युद्ध के चक्रव्यूह से अधिक
जीवन के षड्यंत्र व्यूह के विरुद्ध
अपनी वाणी में सान सके
अपने माँ-पिता के प्रणय सींजे शब्द

गर्भस्थ माँ
अपनी देह ऊपर
चाहती है सैनिक पिता की मातृभूमि प्रेरक
रक्षात्मक प्रिय हथेलियाँ
अजन्मे शिशु के लिए
कि देह-गर्भ की माटी में पड़े
प्रणय-बीज की काया में
उभर सके
सैनिक हथेलियों के छापे
दस्तावेजी मोहर की तरह अनोखी लिपि में

माँ को देखती हुई देखेंगी
पिता की प्रणयातुर आँखें
अजन्मे शिशु के
शांत गर्भाकाश में
शुभांकित नक्षत्र की तरह

पुलकित किलक की
प्रथम सुगंध को
सूँघ सकेगा पिता
माँ की देह-कुसुम से

जन्म से पूर्व विरही माँ
सिखा देना चाहती है अपने शिशु को
पिता की तरह ही मुस्कराना
उसे देखना
और रह रह कर
अपना सब काम छोड़ कर
चुम्बन देना
जिसमें उसका प्रिय
          शिशु का पिता
भूलता रहा है अपनी थकान

माँ चाहती है
शिशु के गर्भकाल में
उसका प्रिय उसके साथ रहे
अपने प्रथम चुम्बन की तरह

गर्भस्थ शिशु
मान पहचान ले उसे अपना पिता
माँ के बताने से पहले ही
पिता अपनी
आँखों का प्रणयी प्रकाश
शिशु की मुँदी पलकों पर रखे
गर्भ के भीतर ही
प्रणय-उर्मि की अक्षय बूँद

दुनिया देखने से पूर्व ही
गर्भ-गेह के भीतर ही
अनुभव करे
पिता की गोद
बाँहों और छाती के स्पर्श से जाने
पिता के साथ होने का आह्लाद-सुख

माँ
अपने प्रिय के साथ
सूर्योदय देखते हुए
जीना चाहती है
अपने भीतर का सूर्योदय
गर्भ में उसे अपने साथ लिए हुए
कि वह कहला सके
प्रणय का सूर्य-सुत
           प्रकृति-पुत्र

पिता के ओंठों से पहचाने वह
संबंधों की कोमलता
और जाने कि
पिता ने कितना प्यार किया है माँ को

प्रकृति की सर्वोत्तम सृष्टि की तरह
सम्मानित कर अंगीकार किया है उसकी माँ को
अपने जीवन का सर्वस्व सौंप
देह गर्भ भीतर गढ़ा उकेरा है शिशु के रूप में
                                    अपना नाम
खजुराहो के शिल्पी की तरह
जो खजुराहो के मंदिरों की भित्तियों
         और गर्भ गृह में रचने से रह गया
शिल्पी के द्धारा भी
शिशु देह रूप में

एक दूसरे के लिए
पृथ्वी के कोमलतम प्रेम से रचित शिशु
प्रणय का जीवित जीवंत ह्रदय है

दोनों ने मिलकर
बहुत चुपचाप
विध्वंसक दुनिया से
बच बचा कर
रचा है एक महान प्रणय
जैसे
सृष्टि रचने के साथ
ईश्वर ने रचा होगा प्रथम प्रेम

पुनः
पुनर्जन्म लेगा
शिशु के रूप में
प्रणय का विलक्षण प्रतिरूप
लघु मुस्कान की कल्पनां भर से
छलक पड़ते हैं नयन के भीतर
दुग्धामृत की धवलता
ममता से फड़क उठती है पयोधर की नसें
उसके दूध के दो दाँतों की स्मृति में
जो उगेंगे उसके भीतर
चारों दिशाओं में तीर की तरह
विध्वंसक युद्धों के विरुद्ध

इससे पहले शिशु की
दुग्ध दँतुलियाँ धसेंगी
अपने पिता की छाती में
जहाँ उसकी माँ ने बनाया था
अपने 'प्रेम का पहला घर'
गर्भस्थ शिशु से पूर्व
उसके घर के लिए

गर्भस्थ शिशु की
जीवन गति .. स्पन्दन, स्वप्न आहट
और हलचली ध्वनियाँ
रचती हैं सृष्टि के नव-शब्द
माँ के उर-प्रांतर में
पिता के संबोधन के लिए
गर्भस्थ माँ

प्रतीक्षा करती है शिशु के पिता का
चार आँखों से
अपने गर्भस्थ शिशु के ह्रदय और आँखों के
अपनी अधीर आकुल आँखों में साथ लिए हुए ।

(यह कविता विश्व भर के सैनिकों की उन गर्भस्थ पत्नियों को समर्पित है, जिनके पति अपने अपने राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर सीमाओं पर तैनात हैं ।)

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