सोमवार, 25 नवंबर 2013

।। स्मृति में … हिन्दुस्तानी माँ ।।


















मातृभूमि सरीखी माँ
सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच
टघरती हुई
चलाती है अपना समय
देश और परदेश के
अपने घर और परिवार में
ठियाँ के लिए
गठरी सकेले
उजारती रही
अपने जाये बच्चों और रिश्तेदारों के दुआरी दुआरी
और जान गई
कि पिता के देह तजते ही
दरक जाता है
उसके अपने देह से तजा
परिवार का घरौंदा भी

बुढ़ापे के उत्तरार्ध में भी
अपने जीवन के सारे प्रयोग करती हुई
मृत्यु के विरुद्ध
मृत्यु से लड़ती हुई
थकी-हारी माँ
ऋतुओं के बदलाव में
याद करती है
अपने जीवन का ऋतु चक्र
धुँधली दृष्टि
और झुर्राई देह में बरसात होने पर
महसूस करती है बरखा का सुख 
और भीग उठती है मातृभूमि की तरह
स्मृतियों में

थकी-हरी माँ बताती है
अपनी जरूरत
जैसे
यह उनकी ही नहीं
धरती की भी जरूरत है

माँ में बोलती है मातृभूमि
और मातृभूमि में बोलती है माँ

जब
उसकी ही जुती-जुताई धरती पर
खेती करने की जगह
लगता है कोई कारखाना
अपने पोपले मुँह से
चीखती है वह
मशीन से भी अधिक तेज आवाज़ में
जैसे उसकी छाती में भी हो
विष्फोटक बगावत

यूरोप में
रह कर भी
नहीं बदले
उसके धरती के संस्कार
इसीलिए
वह माँ होकर भी
मातृभूमि है
जिसमें समाई है सम्पूर्ण पृथ्वी ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें