सोमवार, 24 मार्च 2014

।। गुहारती गुहार ।।

















शब्दों से
पुकारती हूँ तुम्हें
तुम्हारे शब्द
सुनते हैं मेरी गुहार

तुम्हारी हथेलियों से
शब्द बनकर उतरी हुई
हार्दिक संवेदनाएँ
अवतरित होती हैं
आहत वक्ष-भीतर
अकेलेपन के विरुद्ध

बचपन में साध-साध कर
सुलेख लिखे कॉपियों के कागज से
कभी नाव
कभी हवाई जहाज
बनाने वाली ऊँगलियाँ
लिखती हैं चिट्ठियाँ

हवाई यात्रा करते हुए शब्द
विश्व के कई देशों की धरती और ध्वजा को
छूते हुए लिखते हैं
संबंधों का इतिहास
संयोग-सुख और वियोग-संताप

तुम्हारे संकलित शब्द
अंतरिक्ष की हवाओं-भीतर
गोताखोरी करते हुए
डूब जाते हैं मेरे भीतर
अकेलेपन के विरुद्ध
सलोने संयोग की प्रतीक्षा में ।

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