शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

।। सौंदर्य-शास्त्र ।।


















तुम्हारा-अपना प्रेम
अलौकिक प्रणय-नदी का
लौकिक तट
तटबंध है - मैं और तुम

पूर्णिमा का सौंदर्यबोधी चाँद
मन-भीतर पिघलकर
रुपहला समुद्र बनकर
समा जाता है
आँखों की पृथ्वी में
अपनी जगह बनाते हुए
महासागर की तरह

चमक चाँदनी के रुपहले डोरों से
मन बुनता है सारी रात
अपने लिए सुहाग-चूनर
तुम्हारे लिए सुहाग-साफा

तुम्हारी अनुपस्थिति में
घर का दर्पण रहता है उदास
मेरी तरह सूनेपन से संपूर्ण

घबराए हुए ख्वाब
देखते हैं अपना अक्स
ठंडी साँस की निलाई छूट जाती है
चमकते आईने में
और कभी चटख जाता है
मेरी ही भीतर की घबराई चीख से

विदेश प्रवास में
समय छोड़ जाता है
अपने कुछ पारदर्शी प्रश्नचिन्ह
कि अपनी परछाईं में
देखती हूँ बगलगीर खड़ा तुम्हें
मेरी आँखों के करघे पर
तुम्हारी आँखें बुनती हैं
अलौकिक स्मृति-पट्ट
स्मृति-अधर लिखते हैं
अदृश्य ह्रदय-भाष्य ।

स्वप्न खोजते हैं स्मृतियाँ
स्मृतियाँ देखती हैं नवस्वप्न

अपने अकेलेपन में
तुम्हारी अनुपस्थिति में
स्मृतियाँ रचाती हैं
तुम्हारी उपस्थिति का
प्रणयी सौंदर्यशास्त्र ।

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