सोमवार, 21 अप्रैल 2014

।। मन के भोजपत्र ।।

























स्वदेश से आई
चिट्ठी ने कहा

दुआओं के शब्द
होते हैं चिट्ठियों में
और सपनों की आँखें
खुलती हैं चिट्ठी में

शब्दों की खामोश छाया
शब्द अपने कोमल स्पर्श से
कागज पर छोड़ते हैं स्पर्श की मुलायम भाषा

पिघलता है चिट्ठी में
मन का ग्लेशियर
शब्दों में घर करके
उजाला पहरुआ बन
खड़ा रहता है आँखों के सहमे
अँधेरे के खिलाफ

          घबराए हुए
          समय के विरुद्ध होते हैं
          चिट्ठी के पवित्र शब्द
          मन के पीपल से उड़ आए
          पके पत्ते हों जैसे
          मन-डायरी के सादे पृष्ठों पर
          तुम्हारे वक्ष धड़कनों के शब्द हैं जैसे
          चिट्ठी के शब्द
          मन के भोजपत्र

मन में उगती और सिमटती
ऋतुओं की अंतर्यात्रा से
झरे हुए होते हैं चिट्ठी के शब्द
शब्द-वक्ष में उगे हुए
स्मृति-पुष्प हों जैसे

मन के छत्ते से
शहद की तरह निचुड़ आते हैं
चिट्ठी के शब्द
अपने देश की आत्मीय स्मृति में पगी हुई
होती है स्वदेश से आई चिट्ठी ।

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