रविवार, 27 जुलाई 2014

।। स्त्री का इंद्रधनुष ।।


















घास काटते हुए
अक्सर सोचती है वह
अगर समय को भी वह
घास की तरह काट कर सहेज सकती
तो वर्षों का समय सँभाल रखती अपने पास

तब लिखती वह
समय की वास्तविक सच्चाई
जिसे देखते हुए भी अनदेखा किए रहते हैं लोग
जैसे कुछ हुआ ही न हो ।

वह
सब सच
पुख्ता ढंग से बयान करना चाहती है
समय के अमिट शिलालेख पर
जहाँ किसी के हाथ नहीं पहुँच पाते हैं
ध्वस्त करने के लिए

वह
अपने श्रम को
फसल में बदल देना चाहती है
भूखों की भूख के विरुद्ध

आतंक और युद्ध विस्फोटों की आग और धुएँ के कारण
बंद कर दिया है इंद्रधनुष ने आकाश में दिखना

वह
समय को
नए रंग-संयोजन में गढ़ देना चाहती है
धरती पर
जो चले आ रहे
आकाशी इंद्रधनुष की धारणा से है विलुप्त
काल्पनिक देव इंद्र का नहीं
स्त्री द्धारा रचित धरती पर

अपने समय के लिए
समय का पक्ष

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