रविवार, 10 अगस्त 2014

।। शब्दाकांक्षा ।।

























फड़फड़ाते हुए पन्ने से
कुछ शब्द
पाखी या तितली की तरह
निकल भागना चाहते हैं बाहर

और
कुछ शब्द
गंध की तरह
बस जाना चाहते हैं
पन्नों के भीतर ।

कुछ भी बनने पर
शब्दों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है ।

शब्द सिर्फ सचेत हैं
अपने अस्तित्व के प्रति ।

क्योंकि
आदमी के हाथों
सब कुछ संकट में है

खुद आदमी भी ।

मीठे शब्द में
जब मिठाई का
अर्थ न बचा हो
और मनुष्य शब्द से
जानवर होने की गंध आने लगे ।

शब्द
अपने समय को नहीं देखते अब
चुपचाप अपनी यात्रा में हैं

अनुकूल अर्थ की तलाश में ।

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