सोमवार, 25 अगस्त 2014

।। अधरों पर झरी हुई हँसी की स्मृति में ।।


















तुम्हारी आँखों के सामने
मेरा उदास अँधेरा होगा
काई ढके मौत के काले तालाब से
निकला हुआ

ठिठकी हुई
ओस में
मेरे आँसू की
सिसकियों को घुलते हुए
देखती होंगी तुम्हारी आँखें

हरी दूब पर
झर रही
सुबह की धूप में
तुम्हारे होने की खुशी में
झरी हुई मेरी हँसी की स्मृति में
चुनते होंगे सूर्य-रश्मि
झरे हुए हरश्रृंगार के फूल की तरह
जैसे मैं अकेले में

तने पीपल के पेड़ की
एक शाख पर लटके
मधुमक्खी के मौन शहदीले छत्ते को
देख तुम्हारी स्मृतियों में से
कुछ बूँद शहद की 
गिर-टपकी होंगी
तुम्हारे सूखे अधरों पर
जो याद में
प्रायः हलक तक को
सुखा देती हैं

तुम्हारी हथेलियों की चाह की
कोमल विकलता में
कितना भरोसा देता है चाँद
गहरी आधी रात में
अकेलेपन की ठिठुरन में
जब सारी उम्मीदें
बनावटी कागज का घर लगती हैं ।

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