शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

।। जहाँ न पाखी पहुँचते हैं, न पंख ।।


















तुम्हारे साथ
प्रणय की परिक्रमा
कि जैसे पृथ्वी की प्रदक्षिणा
सूर्य के चतुर्दिक

तुम्हारे साथ
सौर-मंडल के सारे नक्षत्र
दृष्टि और स्पर्श की परिधि में सिमटे
दीप्ति-आलिंगन में हम दोनों को
समेटते हुए जैसे चमकते

तुम्हारे साथ
नक्षत्रों की मुस्कुराहट की चमक का रहस्य
तुम्हारी साँसों में
प्रणय-शब्द सा अर्थ-सुख
अमूर्त पर मूर्त
प्रणय-शिल्पी की अनुभूतियों की प्रतिमूर्ति-मूर्तित
सजग और सजल

तुम्हारे साथ
घूम आती हूँ कभी
मछली-सी
सागर की अतल गहराइयों को जीती-छूती
उड़ आती हूँ कभी
पक्षी-सी
अनाम ऊँचाइयों के सहृदय रंगीन आकाश में

तुम्हारे साथ
प्रणय की परिक्रमा
हाथ थाम ले जाती है मुझे वहाँ
जहाँ न पाखी पहुँचते हैं, न पंख
न मछली पहुँचती है, न जल
न शब्द पहुँचते हैं, न अर्थ
न शोर पहुँचता है, न मौन

तुम्हारे साथ से
प्रणय-सौरमंडल
सरस इंद्रधनुषी नक्षत्र-लोक
जिसे
तुम्हारे नाम से जानती हूँ मैं
जिसकी ऊर्जा
तुम्हारे ऊष्म स्पर्श से पहचानती हूँ मैं ।

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