रविवार, 11 सितंबर 2016

।। विलक्षण संयोग ।।

तुम्हारी
आदतों के आवर्त के घेरे में
रहती हूँ    अक्सर
तुम हो जाने के लिए

अपनी
छाया में स्पर्श करती हूँ
तुम्हारी परछाईं

तब, न मैं तुम्हें छूती हूँ
न स्वयं को
पर
अनुभव करती हूँ
 अनछुई    छुअन

जिसमें सूर्य का ताप भी है
और मेघों की तृप्ति भी
एक साथ
एक बार
विलक्षण संयोग

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

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