शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

।। संतापाग्नि ।।























आँखें
देखती हैं     भीतरिया आँखों से भी
जहाँ मन की पृथ्वी के
पाषाण होने का दर्द है
जो बदल रहा है
काले पत्थर में
भावी भट्ठियों की आग के लिए
जबकि
दुनिया की क्रूर भूख को भरने के लिए
मानवीय मांस पक रहा है

तृषा-तृप्ति के लिए
आवश्यकता है
अमृत-नदी भागीरथी की
तबकि नदियों में
घुल रहा है     विध्वंस का ज़हर

मानव आविष्कृत
मानवीय अमृत-नदी को पी डाला है
दुनिया ने
अपनी दंशकारी प्यास बुझाने के लिए

प्यास लगने पर
आँखें पीती हैं
रेतीली चमक का जल
जो नदी के सूख जाने के बाद शेष है

दुनिया भुला बैठी है
अपनी आँखों के अंतस की पृथ्वी का चेहरा
उसकी आँखें
और मुस्कुराहट पहचानना

कोई हमेशा
भीतर से छीनता रहता है
इंसान का अपनापन
जो हमेशा उसका अपना घोंसला है
साँसों के परिंदों की
स्वप्निल उड़ानों के लिए
सुबह और साँझ के युद्ध विरोधी
बादलों की
रेशमी चमक खींच लाने के लिए

बाहर का आतंक
हर पल
मन के भीतर लड़ता है
एक विश्व-युद्ध की जीत का
दाहक आत्मसंघर्ष

सरकारों के बीच
चलती रहती हैं   शांति वार्ताएँ
व्याकुल-आकुल मन जूझता है    अनवरत
एक अशांत दुनिया से
जिसको रचने में
उसके मन की भागीदारी नहीं है
फिर भी
इस अंतर्युद्ध के संघर्ष में
लेनी पड़ती है     जानलेवा हिस्सेदारी
जिसकी जीत संदिग्ध है

बिना किसी दस्तावेजी इतिहास के
सिर्फ़ स्मृतियों की धरती पर
स्वप्नों की मृत्यु की क़ब्र बनती रहती है
आँखें जीती और पोंछती रहती हैं
और ओंठ अर्पित करते रहते हैं
ऐसे में भी       विश्वास के शब्द

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

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