रविवार, 18 सितंबर 2016

।। अपने ही कंधों पर ।।
















बहुत बेचैन रहते हैं    सपने
दिमाग़ के क़ैदख़ाने में जकड़ गए हैं     सपने ।

युद्ध की ख़बरों से सैनिकों का ख़ून
फैल गया है     मन-मानस की वासंती भूमि पर ।

बम विस्फोटों के रक्त रंजित दृश्यों ने
सपने के कैनवास में रंगे हैं    ख़ूनी दृश्य
अनाथों की चीख़-पुकारों से    भरे हैं कान
संगीत की कोई धुन अब नहीं पकड़ती है  मन के सुर

छल और फ़रेब की घटनाओं ने
लील लिया है      आत्म विश्वास
एक विस्फोट से बदल जाता है     शहर का नक़्शा
विश्वासघात से फट जाता है संबंधों का चेहरा
कि जैसे अपने भीतर से उठ जाती है     अपनी अर्थी
अपने ही कंधों पर ।

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

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