शुक्रवार, 2 मई 2014

।। फ्रान्क द बूर - 2014 चैम्पियनशिप ।।


















नीदरलैंड ही नहीं
विश्व के फुटबॉल चहेतों का
प्रिय कोच फ्रान्क द बूर

देश के फुटबॉल प्रेमी
कोच से तय करते हैं अपना क्लब

27 अप्रैल 2014 को
आयक्स ख़िलाड़ी
पुनः हुए चैम्पियन अपने राष्ट्र के

27 अप्रैल 2014 को
वंश परम्परा में सौ वर्षों बाद महाराजा हुए
वलिम एलेक्ज़ेंडर ने मनाया
अपना सैंतालिसवाँ जन्मदिन आज ही के दिन

राष्ट्र
हर्ष और आनंद के उत्साह में था
मीडिया और अख़बार में
चेहरे थे महाराजा वलिम एलेक्ज़ेंडर
                     महारानी मैक्सिमा
                     कोच फ्रान्क द बूर
देश का अविस्मरणीय
ऐतिहासिक दिवस
राष्ट्र को मिला एक श्रेष्ठ राजा
जिसने वर्ष भर में
आर्थिक संकट काल में
एक बिलियन की कमाई करायी देश को
अपने उद्यम और दूरदर्शिता से
विश्व से बनाये सघन संबंध
और वर्ष भर दौरे किए
अपने देश में

तथा
फुटबॉल प्रेमियों को मिला
एक विशिष्ट कोच
विनम्र कोच
साधक फुटबॉल कोच
फ्रान्क द बूर
सुपर द बूर

अपने जुड़वाँ भाई रोनाल्ड के साथ
नवसिखवे खिलाड़ियों को
वर्ष भर में करते हैं दक्ष
और बना देते हैं चैम्पियन
लगातार चौथी बार

अपनी माँ के गर्भ में
नौ माह साथ रहे फ्रान्क और रोनाल्ड
अपने जीवन के गर्भ में भी हैं एक साथ
आयक्स फुटबॉल क्लब की हैं
यह दोनों आँखें
क्लब के चेहरे की पहचान

मैच के दौरान
खड़े रहते हैं अपना पैर
अपने भीतर बाँधे
उनके पाँवों की चालों को
खोलता हैं उनका मुँह
और करते रहते हैं संकेत
रह रह कर बेचैन होकर
और बजाते हैं सीटियाँ

नब्बे मिनट तक
अपने खिलाड़ियों से अधिक
बेचैन और उतावले रहते हैँ फ्रान्क
गोल बिदकने पर
उनसे अधिक
हताश होते हैं फ्रान्क
अपने में ही खदबदाते हुए
उनसे ज्यादा कोसते हैं खुद को
पर कभी
अपने खिलाड़ियों पर चीखते हैं
और कभी फट पड़ते हैं अचानक ही
लेकिन
टीवी पत्रकारों से साक्षात्कार के क्षणोँ में 
नहीं चूकते हैं
अपने खिलाड़ियों के गुर बताने 
और पीठ थपथपाने में

वर्ष भर
अपने पैंट की जेब में
मुट्ठियाँ भींचे
फ्रान्क द बूर
देखते रहते हैं
फुटबॉल की दुनिया के अन्याय और अनाचार
अम्पायरों का अनदेखापन
पेनाल्टी और लाल-पीले कार्डों के पीछे की कुटिलता
पर
आयक्स क्लब के खिलाड़ियों के चैम्पियन बनते ही
जेब से निकाल बाहर हथेलियाँ
तानते हैं दोनों मुट्ठियाँ आकाश की ओर
और नील वक्ष पर
दर्ज करते हैं अपने खिलाड़ियों की उजली खुशी
और फुटबॉल कौशल के जीत का एक और वर्ष
अपनी मुस्कराहट से
खिलाड़ियों में रचते हैं आशीष
चैम्पियन होने का हर्ष और सुख

वर्ष भर
हर सप्ताह की जीत के आनंद को
सकेलते रहते हैं अपने भीतर
जो सेशन के अंत में
चैम्पियन बनने पर
खुलती और खेलती है उनके चेहरे पर

अपने सिखाये खिलाड़ियों को
वे बनाना चाहते हैं अपने से भी बेहतर ख़िलाड़ी
बेईमान, भ्रष्ट और बिकाऊ हो रही
खेल की दुनिया के विरुद्ध

पाँव में
डालते हैं खेलने का कौशल
और मन को
सिखाते हैं धैर्य और साहस का गुर
खिलाड़ियों को एक साथ साधना होता है
धन से मुक्त
तन और मन का गत्यात्मक संयोग
मेधा के लक्ष्य में होता है गोल
क्योंकि अनगिनत पैरों के बीच
फुटबॉल की तरह ही
तेज दौड़ती हुई दुनिया भी
एक तरह की अस्थिर फुटबॉल है
जिसे
भरोसे और काबिलियत से ही
हासिल किया जा सकता है ।

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