मंगलवार, 27 मई 2014

।। पूर्णिमा ।।


















पूर्ण चाँद
अपने रुपहले घट के अमृत को
बनाकर रखता है
तरल पारदर्शी
नारियल फल भीतर
चुपके से
गहरी रात गए
अनाथ शिशुओं का दूध
बनने के लिए
निर्धन का धन
सूरीनामी वन
जिन पर ईंधन भर
या हक़ छावनी छत पर
जैसे गाय या बकरी का
पगडंडियों की घास पर
होता है हक़

पत्तों की छतों पर
पुरनिया टीन की छाजन पर
चंदीली वर्क लगाता है चाँद
ताजी बर्फी की तरह
मीठी लगती है गरीब की झोपड़ी
विश्राम के आनंद से भरपूर ।

रुपहले रंग की तरह
पुत जाता है चाँद
पूर्ण पृथ्वी पर
बगैर किसी भेद के
जंगल … नदी … पहाड़ … को
एक करता हुआ

घरों को अपने रुपहले
अँकवार में भरता हुआ
मेटता है गोरे-काले रंग के
भेद को

पूर्ण चाँद
प्रियाओं के कंठ में
सौंदर्य का लोकगीत बनकर
तरंगित हो उठता है
जबकि
रात गए सन्नाटे में
सींझुर भी
अपनी ड्यूटी से थककर
सो चुका होता है
नए कोलाहल के
स्वप्न देखने के लिए ।

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