शनिवार, 10 मई 2014

।। स्मृति कथा ।।

























सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच
जागता-जीता है देशपुत्र सूरीनाम
सविता गूँथती है फूलों में कांति के गजरे
घन-घटाएँ धोती हैं धरती देह
सूर्य रश्मि से दमकता है सूरीनाम
चाँद के रुपहले स्वप्न देखता है सूरीनाम
वर्ष भर वसंत-श्री का सौंदर्य भोगता हुआ
दिन में कई बार वर्षा का हर्ष पीता सूरीनाम
सुगंधित निर्मल प्रकृति का मनोहर स्तबक है ।

सूरीनाम कमोबेना नदी के सिरहाने
जीवन की वंशी डाले
भारतीय स्मृतियों में खोया
स्वप्नों में बिछुड़े स्वजन खोजता
धरती को रोज बनाता है
अगवानी के काबिल
और विहान से अगोरता है राह
एक अप्रवासी भारतीय
प्रवासी भारतीय की प्रतीक्षा में
राहों का अन्वेषी बन खड़ा है
अटलांटिक महासागर के तट पर
सूरीनाम की वसुधा के लिए

भारतीय प्रवासियों की
नवतुरिया पीढ़ियों की आँखें
बरस पड़ती हैं आत्मीय आँखों से बतियाने के लिए
नदी की तरह समा जाना चाहती हैं एक-दूसरे में
भारत का स्पर्श कर आई किरणें
अपनी स्वर्ण-स्याही से
लिखती हैं रोज एक भारतीय चिट्ठी
सूरीनाम देश के नाम

सूरदास के पद में श्रीकृष्ण पूछते हैं उद्धव से
ऊधौ ! मोहे ब्रज बिसरत नाहीं,
सूरीनामवासी गले-लिपट भारतीय से पूछता है
अपने आजा-आजी के घर-द्धार के हाल-चाल

सरनामी पुरखों के गुलामी जिए पंचतत्व
समा चुके हैं सूरीनाम के पंचतत्वों मेँ
भारतीय पंचतत्वों से बनी देह-माटी के
खून-पसीने से बनी सरनामी धरती
भारतीय प्रवासियों की मातृभूमि
भारत भूमि के सदृश्य !

देह से दूर हुए पूर्वज-पुरखे
मन की देह-घर में हैं बचे-बसे हुए
खोलते हैं जीवन के अनजाने सजीले रहस्य
ह्रदय के नक्शे के भीतर
अत्यंत आत्मीय
अपनी ही आत्मा की तरह ।

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