रविवार, 11 मई 2014

।। शब्द-बैकुंठ ।।


















बादल
चुप होकर बरसते हैं
मन-भीतर
स्मृति की तरह

सुगंध
मौन होकर चूमती है
प्राण-अन्तस
साँसों की तरह

उमंग
तितली-सा स्पर्श करती है
मन को
स्वप्न-स्मृति की तरह

विदेश-प्रवास की
कड़ी धूप में
साथ रहती है
प्रणय-परछाईं

सितारे
अपने वक्ष में
छुपाए रखते हैं प्रणय रहस्य

फिर भी
आत्मा जानती है
शब्दों के बैकुंठ में है
प्रेम का अमृत ।

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