बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

।। आकांक्षा का अल्पना-लोक ।।

























एकनिष्ठ पूजा के लिए
रचा है मूर्ति को
कल्पना का एक
अद्भुत अल्पना-लोक
जहाँ सिर्फ अनुभूति सुख है
आत्मीय बूँदों का

तुम्हारी साँसें
तैरने लगती हैं
मेरी मन साँसों में
मछलियों की तरह
और धोती हैं
अपना रुपहला वर्ण
और रंगीन चंचलता

मेघों के बीच से
आती हुई धूप
धरती पर
रचती है  मेघ का छाया वृक्ष
जैसे तुम्हारी आवाज
मेरे भीतर तुम्हें ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें