रविवार, 19 अक्तूबर 2014

।। जैसे बीज की पुलक सुनती है धूप ।।


















सुदूर से
आत्मवत होती हुई उजास-सी
महसूस होती है धड़कनों की थिरकती गूँज

अनुभूति की कोमल वीथियों से
गुजरता है
तुम्हारी साँसों का आत्मीय संस्पर्श
संबंधों का ताप
रक्त में प्रणय उत्ताप
आत्मा की शक्ति बनकर

अगोरता है सिर्फ तुम्हारी
न हारने वाली हेरती दृष्टि
जिसे मैं देखती नहीं, सुनती हूँ

जैसे
झरनों का घोष
सुनती है झील

जैसे
किरणों का मौन
सुनता है आकाश

जैसे
सागर का उत्ताप
सुनती हैं हवाएँ

जैसे
दरार की वेदना
सुनती है धरती

जैसे
बीज की पुलक
सुनती है धूप

जैसे
ऋतु खिलने का सौंदर्य
सुनती हैं हवाएँ

वैसे ही
सुनती हूँ तुम्हारा मौन
तुम्हारे स्पर्श की तरह

सुनती हूँ तुम्हें दिन की तरह
महसूस करती हूँ रात की तरह ।

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