गुरुवार, 16 अक्तूबर 2014

।। अभिमंत्रित साँसों ने ।।


















मेरे-तुम्हारे
प्रणय की साक्षी है प्राणाग्नि
अधरों ने पलाश पुष्प बन
तिलक किया है प्रणय भाल पर
मग-मृग की कस्तूरी जहाँ सुगन्धित है
साँसों ने पढ़े हैं अभिमंत्रित
सिद्ध आदिमंत्र

एक-दूसरे के देह-कलश के
अमृत-जल ने
पवित्र की है देह
जो प्राणवन्त हुई है
भीग-भीग कर

सृष्टि की सुकोमल
पुष्प-पाँखुरी अधर ने
अपने मौन स्पर्श से
लिखे हैं
वक्ष पट्टिका पर
प्रणय के अघोषित शब्द
जिन्हें स्पर्श की आँखें
जानती हैं पढ़ना

देह के हवन-कुंड में
पवित्र संकल्प के साथ दी है
अपने-अपने प्राणों की
चिरायु शक्ति

प्रणय शिशु के
चिरंजीवी होने के लिए
प्राण-प्रतिष्ठा की है साँसों की
देह की माटी में
रोपे हैं जौ
प्रणय के प्रथम-बीज ।

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