गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

।। विदेह-देह की गोदावरी ।।

























तुम
मेरे भीतर
अन्वेषित करते हो
अन्तः सलिला
और अमृत जल

मैं
तुम्हारे भीतर से
अनाम समुद्र
जिसके आवेग में
विलुप्त हो जाती है देह

तुम
मेरे अन्तस् की
अबोधित गुहा-गेह को
करते हो सम्बोधित
लिखा होता है
स्पर्श में तुम्हारा नाम
आत्मा के नम-ऊष्म तोष के लिए

तुम
मेरे निष्प्राण पहाड़ों में
उँगलियों की आँखों से खनते हो
और रचते हो साँसों के अधरों से
गन्धमयी सरस पुष्प-घाटी
आत्मा जान जाती है
जीवन की प्रकृति का
अलौकिक सौंदर्य-सुख ।

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