गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

।। परछाईं खोजती हुई ।।


















साँसों की आहटों की
परछाईं खोजती हुई
मेरी छाया
साँसों की सुई में पिरोती है
तुम्हारे नाम का धागा
सीती है ...भरती है ...
अपना दो टुकड़े हो चुका समय

तुम्हारे साथ
एक ठौर की तलाश में
बचा है - समय का बेचैन कातर टुकड़ा
आँसू की शक्ल में
कोरों में सिसकता हुआ - साँसों के साथ

तुम्हारे पिघले हुए मन की छवि
ठिठकी हुई ठहरी है   मन में
तुम्हारे नाम की शब्द बनी हुई
जो
साँसों से उपजती है
साँसों में समाती है
जीती और जागती है
धड़कनों में
सिहरनों में
ध्वनियों में

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