शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

।। देह गढ़ती है ।।


















प्रेम
उजाले की तरह
भरता है देह
धड़कनें छोड़ती हैं
पग-चिन्ह
स्मृति के पृष्ठों पर

प्रेम
चाँद की तरह
उतरता है अंतस के सर्वाङ्ग को
चाँदनी में बदलते हुए

उमंगें उठती हैं
लहरों की पैंगें बढ़ाकर

शब्द
बदल जाते हैं
संवेदना में    अनजाने ही
पिघलते हैं
ढलते हैं
लेते हैं आकार
सौंदर्य में
स्पंदन में
कि शब्दों की देह में
धड़कने लगते हैं  अर्थ
प्राण सरीखे

ऐसे में
चुम्बन
बनाता है देह को
चुम्बकीय और पारस

देह गढ़ती है
अपने ही भीतर
स्वर्ण तप्त  अनुभूति कुंड
पवित्र सुख के लिए
सृष्टि का प्रस्थान बिंदु

प्रणय
अलौकिक
पर अनंत
अहर्निश सक्रिय
समय की तरह

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