गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

।। उसकी आँखों में ।।


















मन की सरहद पर
तुम्हारा ही पहरा है
मन की धरती
सुनती है तुम्हारे शब्द

जो उपजते हैं समर्पण से
पूरी निष्ठा के साथ
जैसे पहरूए तैनात हैं
अपने प्राण देकर
सरहद के पक्ष में

मेरा मन
तुम्हारा ही देश है
जहाँ से मिलती है
हमें शक्ति
धरती के पक्ष में खड़े होने की
जो संकट में है
स्त्री और प्रेम की तरह

जब तक दुःख में रहेगी स्त्री
कभी नहीं पनप सकेगा प्रेम
संपूर्णता में सृष्टि की तरह
जब तलक, स्त्री समझी जाती रहेगी सिर्फ देह
प्रेम कभी नहीं उझक सकेगा सच्चा निर्मल
उसकी आँखों में
जहाँ से देखती है वह दुनिया, पुरुष और
उसका प्रेम

1 टिप्पणी:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 30 अप्रैल 2016 को लिंक की जाएगी ....
    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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