शनिवार, 11 मई 2013

।। शब्द-सच ।।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
तुम्हारे शब्द
भावना की स्वर्णिम गिन्नी हैं
ह्रदय के टकसाल में निर्मित

प्रेम के
एक ही सिक्के हैं हम दोनों
जिसकी
पहचान और धातु एक है ।

अपने संबंधों के लिए
रची है मैंने
एक अनूठी भाषा
जिसके शब्द
रातों के एकांत
और नींद के सपनों ने रचे हैं

अपना प्रेम
अलौकिक प्रणय नदी का
लौकिक तट

प्रणय की पूर्णिमा का
सौंदर्यबोधी चाँद
मन-भीतर पिघल कर
रुपहला समुद्र बन कर
समा जाता है
आँखों की पृथ्वी में
अपनी जगह बनाते हुए
महासागर की तरह ... । 

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