शुक्रवार, 3 मई 2013

।। अनुभूति-रहस्य ।।



















प्रेम के क्षणों में
अनुभूतियों का सुख रहस्यमय होता है ।

तुम्हारे सुख का रिसता हुआ रस
मेरे प्रणय का रस है
जो तुमसे होकर मुझ तक पहुँचता है ।

प्रेम एकात्म अनुभूतियों की
अविस्मरणीय दैहिक पहचान है ।
प्रेम में मन
सपने सजाता है तन के लिए
प्यार में मन-तन
वसुधा से समुद्र बन जाता है
देह की धरती समा जाती है
मन के समुद्र में

एक दूसरे में
अनन्य राग ।

अनुराग की साँसों में
माटी से पानी में बदल जाती है
संपूर्ण देह ।

देह के भीतर के बर्फीले पर्वत
बादल की तरह उड़ने लगते हैं देहाकाश में
इन्द्रधनुषी इच्छाओं के बीच ।

प्रेम में
भाषा का कोई काज नहीं होता है
प्यार ही प्यार की भाषा है
देश-काल की सीमाओं से परे ...। 

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