मंगलवार, 21 मई 2013

दो कविताएँ


















।। आत्म विसर्जन ।।

वसुधा
सूरज से अर्जित करती है
अपना दिवस ।

साँसें
हवाओं से
अर्जित करती हैं
अपने लिए धड़कनें ।

नदी से
अर्जित करनी पड़ती है
जल और पवित्रता ।

ईश्वर से
अर्जित करना पड़ता है
उसका आशीर्वाद ।

सूर्य से
अर्जित करते हैं
ताप और ऊर्जा ।

वैसे ही
तुमसे अर्जित करते हैं तुम्हें
आत्म-विसर्जन में ।

।। आत्म-निवेदन ।।

मेरे भीतर
छूट गया है
तुम्हारी आँखों का लिखा
चाहतों का पत्र
फड़फड़ाता बेचैन
तुम्हारी आँखों की तरह ।

तुम्हारी पलकों की बरौनियाँ
मुझमें लिखती हैं
स्मृतियों के गहरे सुख
अन 'जी' आकांक्षाओं की प्यास ।

मेरे भीतर
शेष है
तुम्हारे प्रणयालिंगन की
स्मरणीय छुअन
उस परिधि के भीतर
समाकर
घुल जाती हूँ स्नेह में
और बन जाती हूँ नेह-सरिता ।

तुम्हारी परछाईं में
मिल जाती है मेरी परछाईं
एकालोप । 

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