रविवार, 19 मई 2013

।। सर्वस्व ।।

























साँस ले रहे हैं

अधरों में अधर
आँखों में आँखें
साँसों में साँसें
हथेली में स्पर्श ।

ह्रदय में
धड़क रही हैं
तुम्हारी धड़कनें
अनहद नाद की तरह ।

अपने सर्वांग में
मैं जीती हूँ तुम्हारा सर्वस्व
तुम्हारे शिवत्व को
साध रही हूँ अपनी शक्ति में

तुममें
खुद को खोकर ही जाना
प्रेम में जीना ही अर्धनारीश्वर
हो जाना है ।

सर्वस्व विसर्जन की
समर्पणी साधना के बाद
देह की काँति
शक्ति के रूप में
भीतर ही भीतर
रच रही है अंतरंग प्रेम

प्रेम में
देह के भीतर
जाग उठती है प्रेम-देह
ध्वनित होने लगते हैं
आत्मा के प्रणय-शब्द
ओठों को
कहना आ जाता है
अपने मन की बात ।

देह के रंध्र-रंध्र में
बन जाता है
प्रेम रस का प्रणय-कोश ।

जानती है जिसे
सिर्फ प्रणय-देह
रचती है अनुभूतियों का विलक्षण अर्थ-कोश
कालिदास के शकुंतला की स्पर्श-स्मृति ।

प्रेम में
देह के भीतर
जाग उठती है प्रकृति की प्रेम-देह
देह-शिला के शैल
अंतःनिर्झरिणी से भीग उठते हैं
देह का पत्थर
पदार्थ की तरह पिघल उठता है ।

प्रणय में
सम्पूर्ण देह वक्ष हो जाती है
पूरी काया ह्रदय की तरह धड़कती है
प्रणय-निनाद के
शास्त्रीय शब्द की महागूँज
जिसका शास्त्र सिर्फ़ साँसें समझती हैं ।

ग्रीष्म की
टरकी प्यास की तरह
ठहरता है प्रेम
बादलों के आगमन की
पहली आहट की तरह
घुसता है भीतर ।

बरसात की
पहली बूँद की तरह
समा जाता है मन रेत में
रेत से माटी
माटी से देह हुई मन-भीतर
प्रणय की ऋतुओं का सौभाग्य
जन्म लेता है ।

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