मंगलवार, 17 मार्च 2015

।। पंचतत्वों से … पंचतत्वों में ।।


















अपनी आत्मा की माटी से
गढ़ी है प्रणय की सुकोमल देह

अपनी रक्ताग्नि के ताप में
ढाली है प्रणय की अक्षय काया

अपनी साँसों की वसन्ती बयार से
फूँके हैं प्राण प्रणय की अलौकिक देह में

अपने अश्रुजल के अमृत से
किया है देह का विदेह अभिषेक

मेरे ही पंचतत्वों से
पंचतत्वों में अवतरित है मेरा प्रणय

तुम्हारे ही पंचतत्वों से बना है तुम्हारा प्रणय
पंचतत्वों से बना पंचामृत है प्रणय
नयनाधर के लिए ।

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