बुधवार, 25 मार्च 2015

।। छूट जाता है तुम्हारा देखना, मुझमें ।।


























तुम्हें देखने के बाद
छूट जाता है तुम्हारा देखना, मुझमें
तुम्हें जी भर-भर के देखने के बाद
आँखों को रह जाती है
शिकायत … फिर भी … हर बार

तुम्हें सुनने के बाद भी
शेष रह जाता है सुनना
कुछ शब्द तुम्हारे पास छूट जाते हैं
विकल
मेरी गोद में आने के लिए
बहुत कुछ सुनने पर भी
सब कुछ सुनना बचा रहता है
अन्तस् की मौन प्रशान्ति में

तुम्हारे लिखने के बाद
कुछ भोले-सहमे शब्द
चिपके रह जाते हैं तुम्हारी उँगलियों में
छूटे हुए स्पर्श-बोध की तरह
जैसे धूप का ताप
मुट्ठियों में ठिठका रह जाता है
जैसे पसीजी हथेलियों में
शेष रह जाती है स्मृति की आर्द्रता

तुम्हारे साथ
चलने पर भी
परछाईं भर साथ बच जाता है
हमेशा
हर बार बोलने पर भी
कुछ शब्द बाहर आने से रह जाते हैं
कुछ शब्द सकुच कर
छिप जाते हैं तुम्हारे ही भीतर
मन घर बनने से रह जाता है
कुछ साँसें बच जाती हैं
कि प्राण-प्रतिष्ठा छूट जाती है

पूर्णिमा के दिन भी
चाँद के भीतर छिपी रह जाती है ज्योत्स्ना
सूर्य अपनी गोद में
हर दिन छुपा रखता है अपनी कुछ रश्मियाँ
हर चित्र में
छूट जाती हैं कुछ रेखाएँ कुछ रंग
हर बार रचने पर भी
छूट जाता है कुछ रचना

तट छूट जाता है जल में
जल में छूट जाता है तट-बंध
ऐसे ही हर बार
प्रणय में छूट जाता है प्रणय
प्रतीक्षा की कसक में
छूट जाती है प्रतीक्षा की कसक
अगली प्रतीक्षा तक के लिए ।

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