।। आँखें ।।


















आँखें
बोती हैं पाखी की तरह
देह-भीतर
प्रेम बीज
पाषाण-देह की दरार उर में
उग आता है देव वृक्ष

आँखें
देह भूमि में
खड़ा करती हैं
प्रणय का कल्पवृक्ष

आँखें
देहाकाश में
सँजोती हैं
शीतल चन्द्रकिरणें
ऊष्ण सूर्यरश्मियाँ

देह के
पंचतत्वों में
अलग-अलग ढंग से
घटित होता है प्रेम
अलग-अलग रूपों में
फलित होता है प्रेम ।

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