शुक्रवार, 20 मार्च 2015

।। एक लड़की के भीतर ।।


















एक लड़की के भीतर जब
उगता और उमगता है प्रेम
नवांकुर बीज की तरह
वह
कविता की देह छूती है
अधरों पर गीतों के बोल रखती है

एक लड़की के अन्तस् को
हरी, मुलायम, शोख, दूब की तरह
स्पर्श करता है प्रेम
वह पालती है सफेद खरगोश
गुलाबी आँखों वाला
और भरती है विद्युतीय चपल छलाँगें
बचाए रखना चाहती है वह
प्रेम से चंचल हुए
अपने पाँव के अचंचल निशान
मन-वसुधा पर
उकेरे प्रणय-कीर्ति के लोक-कथा चित्र

एक लड़की के भीतर जब
अँगड़ाई लेता है प्रेम
वह नहीं तैरना चाहती
किसी नव परिचित देह के भीतर
सूर्योदय के साथ
उतर जाना चाहती है नदी में
सुनहरी किरणें समेटने
चंद्रोदय के साथ डूब जाना चाहती है
रुपहली नदी में
धवल, अमर स्वप्न-यथार्थ के लिए

एक लड़की के भीतर जब
उठती है प्रणय की मादक गंध
वह उसे 'महुए' की तरह
चूने देती है अपने उर-आँगन में
दुधियाने देती है अपनी आँखों में

एक लड़की के भीतर जब
देह के खलिहान में
फसल की तरह तैयार होता है प्रेम
वह छींट देती है उसे
दोनों मुट्ठी में भर-भर कर जमीन पर
चिड़ियों … गिलहरियों और ऐसे ही बच्चों के बीच

एक लड़की के भीतर जब
अकुलाता है प्रेम
नदी की मछलियों को खिलाती है
अपनी ललाई हथेली से आटे की गोलियाँ
साथ में लाई-दाना
मचलती मछलियों के साथ
खेलती है अपने पाँवों के बीच
अपनी आँखों से पकड़ती है
उनकी चपल … चमक कि जैसे प्रथम प्रेम की दमक

एक लड़की के भीतर जब
आँखें खोलता है प्रेम
पारदर्शी झील से पड़े आईने में
झाँकती है और देखती है
खुद के चेहरे पर पड़ी आड़ी-तिरछी रेखाओं का सच
बेसुध मन
संतप्त सिहरता तन

एक लड़की के भीतर जब
ऋतुचक्र को लाँघता
आता है वसन्त
गमले में लगाती है कैक्टस
और सिरहाने के तकिया गिलाफ पर
काढ़ती है अनाम फूल

एक लड़की के भीतर जब
होती है प्रेम के लिए अमिट गुहार
प्रणय-तट के वृक्ष-वक्ष से पीठ टिका
एकटक ताकती है बहती नदी
कि जैसे प्रणय-धार बीच
आँखों से नहाती-जीती
भीगती रहती है भीतर-ही-भीतर
वृक्ष के वक्ष से सटी
एक आत्मीय वक्ष की प्रतीक्षा में
एक लड़की की धड़कनें
अनपढ़ी इबारत लिखने के लिए
कुछ कोरा भरने-पूरने के लिए ।

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