।। मेघ-मल्हार ।।



















प्रिय
बादल की तरह
भरता है अपने वक्ष में
मेघ की तरह झरता-बरसता है

प्रेम
प्रिय के भीतर ही
फलता है
फूलता है

इसके पूर्व तक
रिक्त और रिक्त
कभी रेगिस्तान की तरह
कभी आकाश की तरह ।

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