।। धुन ।।
















घर में तुम
घर की तरह बचे हो
मुझमें      मेरी तरह

तुम्हारे जाते हुए
पाँवों को
नहीं रोक सके
आँख के आँसू
पर, तुम्हारी परछाईं
बनी है मुझसे
तुम्हारे साथ
तुम्हारी खामोशी में
समाया है      मेरा मौन
जैसे    तुम्हारे शब्दों में
मेरे शब्द
तुम्हारी आवाज में
मेरी धुन

तुम्हारे जूतों को
तुम्हारे पाँव के बिना
रहने की आदत नहीं
पर पाँव भीतर
होने पर भी
उनका 'जी' नहीं भरता है
तुम्हारी प्रतीक्षा में
सिकुड़ रहे हैं
हमकदम होने के लिए

तुम्हारी कंघी को
फिरा लेती हूँ अपने केशों में
तुम्हारी सहलाती
उँगलियाँ हैं       वे

तुमसे उतरे हुए कपड़े
रहते हैं मेरे सिरहाने
तुम्हारी अनुपस्थिति को
भरती हूँ तुम्हारी सुगंध के वक्ष से
जिस पर मेरा सिर
महसूसता है तुम्हें
और सुगंध से
मिलता है रास्ता
तुम तक पहुँचने के लिए
घनेरी रात में

तुम्हारी छोड़ी हुई
हर चीज को
छूती हूँ
कि जैसे अपने
स्पर्श में से
बचे हो तुम
हर वस्तु में
कि
तुम्हारे देखे गए
आईने में आदमकद
देखती हूँ खुद को
अहल्या की तरह
पुनर्प्राणार्जित
मेरी साँसों में
चलती है तुम्हारी साँस
जैसे     तुम्हारे जीवन में
मेरा जीवन ।
 
('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)

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