।। प्रतीक्षा के स्वप्न बीज ।।
















प्रतीक्षा में
बोए हैं  स्वप्न बीज
उड़ते समेल के फाहों को
मुट्ठी में समेटा है
विरोधी हवाओं के बीच

प्रतीक्षा में
मन के आँसुओं ने धोई है
मन की चौखट
और आँखों ने प्राणवायु से
सुखाई है जमीन

अधरों ने
शब्दों से बनाई है   अल्पना
और धड़कनों ने
प्रतीक्षा की लय में
गाए हैं     बिलकुल नए गीत

प्रतीक्षा में
होती हैं    आहटें
पाँवों की परछाईं
हथेलियों की गुहारती पुकार
आँखों के आले में
प्रिय के आने का उजाला समाने लगता है
और एक सूर्य-लोक
खिल उठता है

प्रतीक्षा के सन्नाटे में
कौंधती है
आगमन अनुगूँज
और शून्यता में
तिर आती हैं
पिघली हुईं
तरल आत्मीयता की लहरें
कि समाने लगता है
अपने भीतर
स्मृतियों की परछाईं का
अमिट संसार
आँखों में
साँसों में
पसीज आई हथेली में

आँखों की पृथ्वी पर
होती हैं     तुम्हारी मन ऋतुएँ
नक्षत्र से निरखते हैं
तुम्हारे नयन निष्पलक

चुपचाप परखती हैं     आँखें
अलौकिक प्रभालोक
तुम्हारे प्रणय का
अक्षय आकाँक्षा वलय ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

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