।। दर्पण ।।


















तुम्हारी अनुपस्थिति में
घर का दर्पण रहता है उदास
मेरी तरह     सूनेपन से संपूर्ण

घबराए हुए स्वप्न
देखते हैं    अपना चेहरा
समय छोड़ जाता है
अपने कुछ प्रश्नचिह्न

परछाईं में
उतर आए हो तुम
स्मृतियों से छनकर
मोहक तसवीर में

आँखों के करघे पर
अदृश्य आँखें बुनती हैं
अलौकिक स्मृति पट्ट
स्मृति अधर लिखते हैं
अदृश्य हृदय भाष्य

स्वप्न खोजते हैं स्मृतियाँ
स्मृतियाँ देखती हैं      नवस्वप्न
अपने अकेलेपन में

तुम्हारी अनुपस्थिति में
स्मृतियाँ रचती हैं
उपस्थिति का सौंदर्यशास्त्र
स्वप्न चुपचाप रचते हैं
तुम्हारी अनुपस्थिति उपस्थिति का
अनुपम आत्मीय लास्य

चाँद की चाँदनी की तरह
देह की काँच के भीतर
पसर जाता है तुम्हारा धवल प्रेम
चाँद की
विलक्षण नरमाहट
अनपेक्षित दक्षतापूर्वक
पहुँचती है    पृथ्वी तक
मन के खेतों के बीच
शब्दों की पगडंडियाँ
दूर तलक उनका भविष्य
बाँचती हुई दौड़ जाती है मनतलक

तुम्हारी नसों के रक्त से
अपनी छवि को
छूती हूँ     अपने रक्त में

तुम्हारी छवि में
पूरा विश्व उग आता है     मुझमें
विश्व में तुम्हें
और तुममें देखती हूँ    विश्व

तुम्हारी चुप में
मैं सुनती हूँ
अपने प्यार का सच
आँखें सुनती हैं
प्रेम की आत्मा को
जताने के लिए
अहर्निश । 

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

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